July 1, 2020
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38% स्टार्टअप्स के पास संचालन तक को नहीं बचे पैसे! COVID-19 ने ‘आज’ ही नहीं ‘कल’ में भी छोड़ा है असर

स्टार्टअप ईकोसिस्टम को थोड़ा भी समझनें वाले लोग शायद मेरी इस बात से सहमत होंगें कि स्टार्टअप्स में काम को लेकर चुनौतियाँ थोड़ी अधिक होती हैं और शायद थोड़ी अलग भी। स्टार्टअप में एक Top Management से लेकर किसी Employee तक को काम में अपने-अपने स्तर पर इन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसा नहीं कि कॉर्रपोरेट में काम करने में चैलेंज नहीं होतें, लेकिन हाँ! स्टार्टअप में फ़र्क़ यह है कि चुनौतियों का सामना करते वक़्त एक छोटी सी ग़लती भी, पूरी कंपनी के लिए एक बड़े Risk को दावत दे सकती है।

लेकिन फिर ऐसा क्या है कि आज के समय स्टार्टअप के प्रति लोगों का रुझान इतना बढ़ रहा है और इतने जुनून के साथ लोग इस क्षेत्र में क़दम रख रहें हैं? दरसल कारण है ‘उम्मीद’ और ‘संभावनाएँ’, जी हाँ! ये दोनों ही ऐसी ताक़तें हैं जो लोगों को इस क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करते हुए भी आगे बढ़ते रहनें का हौसला देती हैं।

लेकिन COVID-19 के चलते बनें हालतों ने शायद इन कई ‘संभावनाओं’ को ही एक लम्बें समय के लिए ख़त्म कर दिया है। और शायद इसलिए तेज़ी से स्टार्टअप जगत का एक व्यापक वर्ग बिखरता नज़र आ रहा है। ये मैं नहीं कह रहा, बल्कि ईकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के कुछ आँकड़े कह रहें हैं।

इस रिपोर्ट की मानें तो अब हालात यहाँ तक आ पहुँचें हैं कि देश में 38% से अधिक स्टार्टअप्स के पास संचालन जारी रखने के लिए पैसे ही नहीं बचें हैं। और बुरा यह है कि निवेशकों को भी लम्बें समय तक हालतों में कोई बड़ा पिक-अप होता नज़र नहीं आ रहा है, इसलिए निवेशक भी क़रीब क़रीब अपने हाथ समेटे हुए हैं।

दरसल इस रिपोर्ट में LocalCircles के एक सर्वे के हवाले से यह भी बताया गया है कि क़रीब 4% स्टार्टअप पहले ही बंद हो गए हैं। 16% स्टार्टअप्स के पास क़रीब 3 महीनें से अधिक संचालन का पैसा नहीं बचा है।

राहत की एक ख़बर ज़रूर है कि सर्वे के अनुसार 35% स्टार्टअप्स व SMEs को कुछ महीनों में सुधार के आसार ज़रूर नज़र आ रहें हैं, लेकिन 14% स्टार्टअप्स के अनुसार शायद आने वाले समय में उन्हें बिज़नेस बंद करना पद जाए।

वहीं सरकारी राहत की बातें करें तो रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ़ 14% कंपनियों ने कहा कि ‘आत्मनिर्भर भारत प्रोत्साहन’ पैकेज से उन्हें लाभ मिला हैं, लेकिन 57% का यह भी कहना ने कि इस पैकेज के ज़रिए उन्हें कोई मदद नहीं मिल सकी है। इसके अपने अपने कारण हो सकतें हैं।

लेकिन इतना तय की है कि स्थिति बहुत अच्छी नहीं। मैं किसी को डराना यह डर का माहौल नहीं बनाना चाहता। लेकिन अभी भी हर रोज़ हज़ारों की संख्या में निकालने जा रहें Employees की ख़बरें सुनकर, मैं ये भी नहीं कह सकता कि चीज़ें पटरी पर आनें लगी हैं। क्योंकि जो लोग इससे प्रभावित हुए हैं, उन्हें पता है उनपर क्या बीत रही है। और भले हम और आप अख़बारों में पढ़ कर कि ‘चीज़ें सामान्य होने लगी हैं’ मन को समझा लेते हों, लेकिन जिन लोगों के हाल ही में अपनी नौकरियाँ खोईं हैं, उनके लिए मन कि अख़बार की एक सुर्ख़ी से समझा पाना कठिन है।

हाँ! निराश होना या किसी नकारात्मक सोच से तो वाक़ई कोई हल नहीं निकलने वाला, लेकिन हल निकालनें के लिए यह भी तो ज़रूरी है कि हक़ीक़त को हुबहू पेश किया जाए। बाक़ी फिर कहूँगा मक़सद डराना नहीं है, सिर्फ़ इतना समझिए कि वक़्त थोड़ा कठिन है, और ऐसा भी नहीं है कि उभरने की कोशिशें नहीं हो रहीं हैं, लेकिन शायद तरीक़ों में थोड़े बदलाव और करने की ज़रूरत है! इस बीच आपके कोई सुझाव हों तो हमारें साथ ज़रूर साझा करें!

amicableashutosh@gmail.com'

Co-Founder & Editor-In-Chief
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