संवाद 2018: बेमिसाल लोकप्रियता के बावजूद आखिर 2018 में क्यूँ संघर्ष कर रहा है देश का ‘ई-वॉलेट बाज़ार’

भारत में ई-वॉलेट बाज़ार हमेशा से ही लोगों के लिए उत्सुकता का विषय रहा है। ई-वॉलेट में आते ही बाज़ार में लोगों के बीच काफी लोकप्रियता अर्जित कर ली थी। आलम यह था कि 2006 में जहाँ देश में केवल एक ही ई-वॉलेट मौजूद था, वहीँ 2017 तक इनकी संख्या 60 तक पहुँच गई थी। (स्रोत: भारतीय रिज़र्व बैंक)

लेकिन अब ऐसा लगता है, देश के ई-वॉलेट को लेकर उत्साह कम होता नज़र आ रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक के एक आंकडें के अनुसार देश में ई-वॉलेट की संख्या जहाँ 2017 तक 60 थी, वहीँ अब वह घट कर महज़ 49 रह गई है। इस बीच कई विशेषज्ञ इसकी वजह इस क्षेत्र में होने वाले कम लाभ, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और प्रतिकूल नीति मानदंडों की कमी को बताते हैं।

काफी उत्साह के साथ शुरू हुआ था ई-वॉलेट का सफ़र,

देश में सबसे पहले Times Group और YES Bank ने 2006 में Wallet365.com नामक ई-वॉलेट की शुरुआत करी थी। और इसके बाद से ही कई बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय सेवा फर्म इस क्षेत्र में आते गये। यहाँ तक कि BigBasket, Grofers, और ई-कॉमर्स दिग्गज़ Amazon के साथ ही लोकप्रिय मैसेजिंग सेवा, WhatsApp ने भी इस क्षेत्र में क़दम रखते गये।

हालाँकि Paytm और Mobikwik ने इस क्षेत्र में अपनी एक अलग जगह बनाते हुए ख़ुद के लिए एक सुरक्षित कोना तलाश लिया।

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इस बीच एक आंकड़ों के मुताबिक 2015 -16 में अनुमानित 154 करोड़ रुपये के भारतीय ई-वॉलेट उद्योग कि 2021-22 के अंत तक 30,000 करोड़ रुपये तक बढ़ने की उम्मीद है।

फ़िर क्यों मुश्किल सा होने लगा है ई-वॉलेट का यह सफ़र

अपने एक बयान में MobiKwik की सह-संस्थापक उपासना तकू ने Quartz को बताया,

“ई-वॉलेट अत्यधिक वॉल्यूम और कम रिटर्न वाला व्यवसाय है और यही कारण है कि ज्यादातर कंपनियां इस क्षेत्र में संघर्ष करती नज़र आती हैं।”

“और इसी के चलते उद्योग में संघर्ष कर रही कई फर्मों ने या तो अपने व्यापार को बंद कर दिया या फ़िर वह बहुत ही धीमी गति के साथ आगे बढ़ रहें हैं।”

दरसल ई-वॉलेट व्यवसाय को लाभदायक बनाने के लिए, कंपनियों को न केवल ग्राहक आधार बनाने की आवश्यकता होती है बल्कि इसके साथ ही साथ एक व्यापारी नेटवर्क को भी बनाए रखना पड़ता है। इन सब के साथ ही ग्राहकों द्वारा भुगतान विकल्प के रूप में वॉलेट का उपयोग करने के लिए अन्य अनिवार्य कारणों का भी ध्यान रखना पड़ता है।

और यही कारण है कि अधिकतर फर्म इस खेल में विफ़ल साबित हो जाती है। फ़िर या तो वह बंद हो जाती हैं, या फ़िर उनका अधिग्रहण कर लिया जाता है। जैसा कि हमें बीते कुछ समय में भी देखा है। फ़िर चाहे बात करें Axis Bank द्वारा FreeCharge के अधिग्रहण की या फ़िर
Amazon द्वारा Emvantage, Flipkart द्वारा PhonePe और Shopclues द्वारा Momoe के किये गये अधिग्रहणों की।

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इसके साथ ही सरकार की नीतियाँ भी हैं बड़े रूप में ज़िम्मेदार

इन सबके साथ ही गौर करने वाली बात यह भी है कि सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बनायीं गई नई नीतियों के चलते भी इस क्षेत्र में टिक पाना काफ़ी मुश्किल सा हो गया है। जैसे कि डिजिटल वॉलेट कंपनी की नेट-वर्थ की सीमा 5 करोड़ से बढ़ाकर 2 करोड़ करने से इस क्षेत्र के कई छोटे ख़िलाड़ी प्रभावित हुए हैं।

इसके साथ ही KYC जैसी चीज़ें इन सब को और प्रभावित कर रहीं हैं। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद से आधार के जरिये सिर्फ़ बायोमेट्रिक तौर पर होने वाले वेरिफिकेशन से ये डिजिटल वॉलेट कुछ हद तक उपयोगकर्ता वर्ग को बांधे रखने में कामयाब रह सके हैं।

लेकिन अब इतने कड़े नियमों और मजबूत प्रतिस्पर्धा के बीच देखना यह है कि भारत में ई-वॉलेट का भविष्य कैसा रहता है। और कौन सी नई चीज़ें हैं जो ये डिजिटल वॉलेट उपयोगकर्ताओं को प्रदान कर सकतें हैं।

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नई तकनीकों और विचारों के समायोजन को तलाशता मुसाफ़िर, जिसका मानना है कि उद्यमशीलता और प्रौद्योगिकी मिलकर ही विकास और विस्तार का अवसर प्रदान करतीं हैं | Founder & Editor-In-Chief (TechSamvad)
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