August 8, 2020
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फ़ैसला; WhatsApp जैसी चैटिंग Apps और Email के जरिए भेजें गए कोर्ट समन/नोटिस होंगे मान्य

इस कोरोना महामारी की वज़ह से न जाने तकनीक ने कितना विकास किया है। पहले वैसे काम जो घर बैठें कतई संभव नहीं दिख रहा था वहीं इस लॉकडाउन में हर एक काम घर बैठें बहुत आराम से संभव हो जा रहा है। हम इसे तकनीक के क्षेत्र में आएं बदलाव को ही इसकी वजह मानते हैं। लेकिन तकनीक तो इससे पहले भी था बस अगर साफ शब्दों कहा जाएं तो इस महामारी और लॉकडाउन ने लोगों को एक नई सोच विकसित करने के लिए धकेल दिया है।

ऐसा ही कुछ मामला कल सुप्रीम कोर्ट से सामने निकाल कर आया। सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान यह कहा कि किसी भी व्यक्ति को नोटिस या फिर समन ऑनलाइन माध्यम यानी की WhatsApp, Email अथवा Telegram जैसी इंस्टेंट मेसेजिंग सर्विस के माध्यम से पूरा किया जाएगा और कोर्ट किसी को भी इसके माध्यम से समन भेज सकता है और यह कानूनी रूप से वैध करार होगा।

तीन जजों वाली पीठ जिसमें मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे, जस्टिस आर एस रेड्डी और जस्टिस ए एस बोपन्ना शामिल थे, उन्होंने कहा कि एक तरह ही इस लॉकडाउन में नोटिस और समन की शारीरिक रूप से डिलीवरी बहुत मुश्किल लग रही थी जिसको देखते हुए इस तरह का फ़ैसला लिया गया। यह फ़ैसला बहुत ही उचित है और इससे नए इनोवेशन में मदद मिलेगी।

इस तीन जजों वाली पीठ ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के सुझावों पर भी सहमति व्यक्त की जिसमें इन्होंने कहा था कि ईमेल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से समन और नोटिस भेजने से कानूनी रूप से इसकी डिलीवरी हो जाएगी जिससे प्रतिवादी (Respondent) को अदालत में पेश होने के साथ साथ अदालती प्रक्रिया के दौरान प्रश्न के उत्तर देने में आसानी होगी।

मेसेजिंग सर्विस पर वेणुगोपाल ने कहा कि यह मेसेजिंग सर्विस खुद को एंड टू एंड इनक्रिप्शन होने का दावा करते है जिससे WhatApp के माध्यम से भेजें गए समन और नोटिस को वैध साबित करना काफ़ी मुश्किल होगा।

इसपर जवाब देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर मैसेज के द्वारा भेजे गए नोटिस और समन में दो ब्लू टिक दिखता है तो वह नोटिस और समन वैध माना जाएगा।

हालांकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि WhatsApp के सेटिंग को आसानी से बदला जा सकता है जिसके माध्यम से ब्लू टिक भेजें गए व्यक्ति को नहीं दिखता है। अगर समन और नोटिस उस व्यक्ति के पास पहुंच भी जाएगा तो सेटिंग के माध्यम से यह नहीं पता चल पाएगा कि उसमें ब्लू टिक हुआ या नहीं। यानी कुल मिलकर कहा जाए तो इस सेटिंग में ऐसा लगेगा कि नोटिस और समन नहीं पहुंचा है लेकिन वास्तव में वह पहुंच चुका होगा।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई को चेक वैलिडिटी की अवधि बढ़ाने की भी अनुमति दे दी है। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के द्वारा दिए गए सुझावों को मान लिया और जांच करने पर अपनी सहमति दे दी। जिसमें केंद्र ने कहा कि बैंक के पास कर्जदारों से लॉकडाउन के 45 दिनों के भीतर Letter of Acknowledgement of Debt (LAD) को स्वीकार करने की अनुमति प्रदान की जा सकती है जिससे वसूली की प्रक्रिया से बचा जा सकता है। इससे मुख्य रूप से बैंको और हज़ारों कर्जदारों की चिंता को भी खत्म किया जा सकता है जिसमें लॉकडाउन की अवधि बढ़ने की वजह से उनके 3 साल की सीमा समाप्त हो रही है जिससे पैसे वसूली की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इसको देखते हुए कोर्ट ने केंद्र के इस अनुरोध को भी मान लिया है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक मायने में अपने आप में नया है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से नोटिस और समन भेजना किस हद तक सफल हो पाता है यह तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा। सरकार और न्यायालय जबतक यह सुनिश्चित नहीं कर लेती है कि इससे किसी भी तरह की परेशानी नहीं है और एक बार नोटिस भेजने के बाद अगर डबल टिक हो जाता है चाहें उसमें ब्लू टिक हुआ है अथवा नहीं तब तक इस प्रक्रिया में थोड़ी बहुत समस्या उत्पन्न जरूर होने की संभावना है।

Abhinav Narayan is presently a student of Law from Amity Law School, Noida; and is a vastly experienced candidate in the field of MUNs and youth parliaments. The core branches of Abhinav's expertise lies in Hindi writing, he writes Hindi poems and is a renowned orator. He is currently the President of the Hindi Literary Club, Amity University.
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