July 1, 2020
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[TechSamvad Exclusive] Transgender Inclusion: अभी भी Startup और Corporate इकोसिस्टम में एक सपना ही है!

  • by Samyuktha Vijayan
  • June 21, 2020

[AUTHOR: Samyuktha Vijayan is currently a Principal Technical Program Manager at Swiggy and also their First Transgender Employee. Samyuktha also owns a Clothing Startup, TouteStudio providing employment to the transgender community in Bangalore]

6 सितंबर 2018 का दिन किसे नहीं याद होगा? जी हां! यह वही दिन था जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अभूतपूर्ण फ़ैसला सुनाया था। इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसला सुनाया जिसमें वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक यौन संबंध के लिए बने आईपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक, तर्कहीन, अनिश्चित करार दिया। भारत में LGBTQ समुदाय ने इस फ़ैसले के पक्ष में अपनी ख़ुशी जाहिर की और कहा कि इससे समानता हासिल हुई है। हालांकि अगर ध्यान दिया जाए तो इस निर्णय का सामाजिक प्रभाव इस बात से बिल्कुल अलग है कि अधिकांश लोग समानता के रूप में क्या सोचते और समझते है? गौर करने वाली बात यह है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मामले में स्थिति विशेष रूप से काफी गंभीर है।

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखा जाए तो भारत में विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक पहचानों से संबंधित व्यक्तियों की एक लंबी सूची रही है। अगर देखा जाए तो उत्तर के हिजड़ों और किन्नरों के साथ साथ दक्षिण के अरवनियों और जोगप्पों से लेकर तीसरे लिंग का एक व्यापक इतिहास दर्ज़ है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज के समय में हमारे देश ने धारा 377 की भूमिका को दुनिया के सामने जगाया है और LGBTQ के अंदर जितने भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति है उन्हें अलग धारणा प्रस्तुत किया है लेकिन वही लोग दशकों से हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा रहे है। लेकिन हमलोग देखते है कि उनके साथ हो रहे भेदभाव और मुख्यधारा में आर्थिक रूप से हो रही गतिविधि को बहिष्कृत करने के बारे में ट्रांसजेंडर लोगों पर लागू नहीं किया गया है जो अपने आप में चौंकाने वाली बात है।

अगर आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में करीब ट्रांसजेंडर की आबादी 50 लाख से ऊपर है। विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि उनमें से अधिकांश अपने माता पिता या परिवारों का प्यार और स्नेह नहीं मिल पाता है। यह आंकड़ा भी सही मायने में चौंकाने वाला है। अगर उनके उचित शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण की बात उठती है तो उसमें भी वह काफी पीछे है और इसी वजह से उनमें से अधिकांश लोग अपनी आजीविका और कमाने के तरीके के रूप में भीख या सेक्स कार्यों का सहारा लेते है।

मेरी व्यक्तिगत पहचान रूढ़िवादी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जीवन से काफी अलग है या यूं कहें तो बिल्कुल जुदा है। दक्षिण भारतीय रूढ़िवादी शहर में एक निम्न माध्यम वर्गीय घर में तीन लड़को में से एक मैं था। मैं जीवनभर भेदभाव और अलग थलग होने के लिए तैयार रहता था। लेकिन मेरे माता और पिता ऐसा नहीं चाहते थे। उन्होंने मुझे खुद को पहचानने के लिए हमेशा से प्रोत्साहित किया और मैंने अपने आंतरिक संतुष्टि के लिए भरतनाट्यम सीखना शुरू कर दिया। मैंने अपने आप को हमेशा एक लड़की के रूप में खुद को देखा। वैसे भी आजकल के समय में ज्यादातर लोग खुद को सबसे पहले पहचानते है वहीं हाल मेरा भी था। मैंने अपने माता पिता के समर्थन कि वजह से अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया उसे पूरा भी किया।

मैनें अपने बैच में सभी छात्रों के मुक़ाबले इंजीनियरिंग प्रोग्राम में प्रथम स्थान हासिल किया और उनके मुकाबले ज्यादा पैसे वाली नौकरी भी हासिल की। मल्टी नेशनल कंपनी के साथ काम करने के बाद से मुझे भारत से बाहर रहकर अपने कैरियर पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने का मौका प्राप्त हुआ। मैंने अपने आप को साल 2016 में सिएटल में पुरुष से स्त्री में परिवर्तित किया। ईमानदारी से कहूं तो यह एक केक वॉक था। एक दिन शुक्रवार को मैं ऑफिस संतोष बनकर गया था वहीं अगले सोमवार को संयुक्ता बनकर ऑफिस गई। लोगों ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे मैं हमेशा से ही संयुक्ता ही थी।

साल 2017 में मैंने खुद को बैंगलोर में स्थापित कर लिया और मैंने ट्रांसजेंडर लोगों के साथ उन्हें नौकरी की मुख्यधारा में लाने के लिए काम करना शुरू कर दिया। लेकिन उनके कौशल, उनकी उम्मीदों और कंपनियों की उम्मीदों में जमीन आसमान का फर्क था। इसी बेमेल संरचना की वजह से उनको नौकरी की मुख्यधारा में लाना बेहद कठिन था। ज्यादातर लोग या तो भीख मांगते या फिर सेक्स वर्क में लग जाते थे। इससे वह दिन के 10 घंटे और हफ़्ते के 6 दिन काम करके महीने के अंत तक क़रीब 10000 रुपए कमा लेते थे।

मुख्य रूप से उनके पुनर्वास में मुझे जो सबसे बड़ी समस्या दिखती थी, वह है उनके कौशल और उनकी नौकरी की उम्मीदों के बीच के अंतर को कम करने का एक तरीका। इसको दूर करने का जो सबसे बड़ा तरीका है वह यह है कि कोई इनके लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम और इंटर्नशिप लेकर आए ताकि ट्रांसजेंडर लोगों पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जा सकें और उन्हें प्रशासनिक नौकरियां, ग्राहक सेवा नौकरियां या फिर इसी तरह के कामों में सक्षम होने के लिए कौशल प्रदान किया जा सकें। हाल ही में साल 2019 के अक्टूबर महीने में ANZ के द्वारा एक महीने का ट्रेनिंग प्रोग्राम का आयोजन करवाया गया था जिसमें कंपनी ने ट्रांसजेंडर रिक्रूटमेंट फर्म Periferry के साथ मिलकर लगभग 25 लोगों को जॉब फेयर में शामिल करवाया और इसके साथ ही सभी 25 लोगों को प्रशिक्षण के बाद जॉब फेयर में शामिल होने वाली कम्पनियों से जॉब ऑफर भी दिलवाया।

साल 2014 का NALSA का निर्णय ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उनके लिंग ( पुरुष, महिला या तीसरे लिंग) को परिभाषित करने के उनके अधिकार की गारंटी प्रदान करता है। लेकिन इसके विपरीत हमारे समाज में उन्हें हमेशा से ही तीसरे लिंग के दर्जे पर जोड़ नहीं दिया जाता है जो कि गलत है। उदाहरण के लिए अधिकतर ट्रांस महिला जिनमें मैं खुद भी शामिल हूं, महिलाओं के रूप में पहचाने जाते है न कि तीसरे लिंग के रूप में। इस फ़ैसले के बाद से इसने सरकार को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण प्रदान करने के लिए अपनी सिफारिशें भी की, लेकिन इस व्यवहार में लाना बेहद ही कठिन है। LGBTQ व्यक्तियों का किसी भी कार्यस्थल पर उत्पीड़न एक अपराध है जो भारत की अधिकांश कंपनियों ने इसे अपने संस्कृतियों और नीतियों में पूर्ण रूप से शामिल नहीं किया है। यह बेहद चिंता का विषय है। उम्मीद है कि भविष्य में चीज़ें और भी बेहतर होंगी।

धारा 377 को डालते समय LGBTQ को कार्यस्थल पर शामिल करने के लिए कुछ प्रकाश डाला गया है। लेकिन फिर भी मैं कहना चाहूंगी कि जहां पर हमें अभी रहना चाहिए, वहां से हम काफ़ी दूर है। विशेष रूप से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए समावेशन उनके घर से शुरू होना चाहिए। उनके माता पिता, शिक्षकों, रिश्तेदारों और दोस्तों को यह समझना चाहिए कि अलग होने में किसी भी व्यक्ति को मुश्किल नहीं होनी चाहिए। आपका थोड़ा सा समर्थन और हौसला उनके लिए एक स्थिर बचपन सुनिश्चित करने में एक मिल का पत्थर साबित होता है। इसके पीछे की वज़ह यह है कि वह एक मुक्कमल रूप से वयस्क बन सकें और सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से अपने समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में योगदान दे सकें।


On 6 September 2018, in a landmark judgement, the Supreme Court of India ruled that the application of Section 377 to consensual homosexual sex between adults was unconstitutional, “irrational, indefensible and manifestly arbitrary”. The LGBTQ community in India rejoiced that, finally, equality has arrived. But like most laws in india, the social implication of the judgement is far from what most people could consider as equality. The situation is particularly grim in the case of transgender individuals.

India has had a long history of transgender individuals belonging to a variety of socio-cultural identities. From the hijras and kinnars of the north and the aravanis and jogappas of the south, there is recorded history of the third gender narrative. It is particularly interesting to note that corporate India woke up to a post-section-377 world and would like to treat transgender individuals within the LGBTQ umbrella while they were a visible part of our lives for decades. Unfortunately, the same efforts that may bring some relief for LGB inclusion in a corporate setting can not be applied to transgender people because of how discrimination had brought about their isolation and exclusion on mainstream economic activity.

Unofficial accounts put India’s transgender population on the upwards of 50 lakhs. Various studies reveal that a vast majority of them (some say as high as 98%) do not live their parents or families. And because of the lack of access to proper education or skills training most of them resort to begging or sex work as a way of earning their livelihoods.

My personal journey has been very different from the stereotypical transgender person’s life. Born as one of three boys in a lower middle class household in a South Indian conservative town, I was all set for life long discrimination and isolation, if not for my parents. They encouraged me to be myself and I grew up learning bharatanatyam as a safe space for my inner self. I always knew I was a girl (most people know who they are). Because of my parents and their support I was able to focus on my education.

I graduated top of class from premier engineering program with the highest paying job of all the outgoing students in my batch. Working for MNCs provided me with the space to focus on my career and live and work outside India. I transitioned from male to female when I lived in Seattle in 2016. And in all honesty, it was a cake walk. I went to my office as Santhosh (my previous self) on Friday and went in as Samyuktha on Monday and people treated me as if I was Samyuktha always.

In 2017 I relocated back to Bangalore and I started working with transgender folks to get them into mainstream jobs. But because of the mismatch between their skills, their expectations and what the companies expected, it is very difficult to get them mainstream corporate jobs. And most people would rather beg or do sex work than work 10 hours a day, 6 days a week and earn 10000 rupees at the end if the month.

The biggest problem I see in rehabilitating them is to figure out a way to narrow the gap between their skills and the expectations of a corporate job. And one way to do that is to come up with training programs and internships that focus on transgender individuals (often school or college dropouts) with potential and provide them with skills to be able to take up on administrative jobs, customer service jobs or similar. A most recent one-month training program was conducted in October 2019 by ANZ with the help of a transgender recruitment firm called Periferry and almost all the 25 individuals got offers from companies who attended a job fair after the training.

The NALSA judgment of 2014 guarantees transgender individuals their right to define their gender ( male, female or third gender) but society insists on calling them third gender, always. For eg: most transwomen, including myself, identify as women and not the third gender. The judgement also put forth recommendations to the government to provide reservation for transgender individuals in areas of education and employment but it has been very difficult to put that into practice. And any workplace harassment of LGBTQ individuals is an offense that most of companies in India have not completely incorporated into their corporate culture and policies. Hopefully things will get better in the future.

While writing down of section-377 has thrown some light for LGBTQ inclusion at the workplace, we are far from where we should be. Especially for transgender individuals, inclusion should start at home. Parents, teachers, relatives and friends should understand that being different need not have to be difficult for the individual and a little bit of support goes a long way into ensuring a stable childhood for them to become confident adults and a valuable member of the society contributing to its social and economic setup.

[Image Source: Businessinsider.in]

Samyuktha Vijayan, who hails from Coimbatore, in April became Swiggy's first transgender employee when she was appointed as Principal Programme Manager. She is also an entrepreneur, with her clothing startup TouteStudio, providing employment to other transgender people in Bengaluru.

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