July 3, 2020
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मुख्यमंत्री योगी द्वारा FedEx, Cisco, Adobe जैसी कंपनियों को चीन छोड़, यूपी आने का न्यौता देने के क्या हैं मायनें?

मौजूदा समय जाहिर तौर पर दुनिया भर के इतिहास में एक बड़ी चुनौती के रूप से दर्ज होगा। कोरोना वायरस या कहें तो COVID-19 ने दुनिया भर में न सिर्फ वर्तमान समय पर, बल्कि आने वाले भविष्य में भी एक बड़ा असर दर्ज करवा दिया है।

समझिएगा! इसके दो पहलु हैं एक तो इस महामारी के बाद जहाँ दुनिया भर के ‘सामाजिक ढांचें’ में कुछ अहम बदलाव दर्ज किये जायेंगें, वहीं आगामी दिनों में ‘आर्थिक मोर्चे’ पर भी देश और दुनिया के लिए यह महामारी कई बड़े बदलावों का कारण बनेगी।

लेकिन एक ओर सामाजिक मोर्चें के बदलावों की परिकल्पना अभी से करना भले शायद जल्दबाजी हो, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर हो सकने वाले कई बदलावों की छवि थोड़ी-थोड़ी साफ़ होती जा रही है। तमाम ख़बरों, रिपोर्ट्स व दुनिया भर में बने माहौल के चलते लगभग कई बड़े देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन के खिलाफ़ खड़े नजर आ रहें हैं। हालाँकि अभी अमेरिका और कुछ चुनिंदा देशों को छोड़ चीन के साथ व्यापारिक जंग अन्य कोई देश नहीं करना चाहता और इसकी एक बड़ी वजह भी है। वजह है कि जब भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली जैसे तमाम दिग्गज देश कोरोना वायरस के चलते अपने उद्योग धंधों को बंद करने के लिए मजबूर हैं ऐसे में चीन में पुनः उद्योग जगत वापस पटरी पर लौटता नजर आ रहा है और इसलिए चीन फ़िलहाल के दिनों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन सकता है।

मौजूदा समय में सबसे अहमियत रखने वाले Personal Protective Equipment (PPE) किट भी दुनिया भर में सबसे अधिक चीन से ही सप्लाई किये जा रहें हैं। बता दें 14 अप्रैल को द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले भारत में चीन से 15 मिलियन (1.5 करोड़) PEE किट आने वाली हैं। विवाद इसको लेकर भी है, असल में कई रिपोर्ट्स की मानें तो जनवरी के शुरुआती हफ़्तों में ही चीन ने दुनिया भर से करीब 2 बिलियन PEE किट मंगवाएं थे, जिसमें कनाडा से ख़रीदे गये 16 टन प्रोटेक्टिव कपड़े, फेस शील्ड, मास्क, काले चश्मे और दस्ताने आदि भी शामिल हैं। और अब चीन पर यह आरोप लगाये जा रहें हैं कि वह दुनिया भर से खरीदें और अपने यहाँ स्थानीय स्तर पर निम्न दर्जें की यही चीज़ें बना कर विश्व भर में देशों को अधिक कीमतों पर बेंच रहा है।

Yogi Adityanath, CM Yogi , FedEx, Cisco, Adobe, China, Uttar Pradesh, COVID 19 Impact,

ऐसे में कई प्रमुख देशों के साथ चीन के संबंध खट्टे होते जा रहें हैं और इसलिए दुनिया भर के देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां जो चीन को अपने कारखानों और व्यवसाय के लिए एक हब की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, उन्हें यह डर सताने लगा है कि अगर उनके देशों की सरकार ने चीन के खिलाफ कोई कदम उठाया तो इससे उन कंपनियों को भी भारी नुकसान सहना पड़ सकता है। इसका उदाहरण हम बीते कुछ सालों से चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध में देख सकतें हैं, जिसके चलते Google और Huawei जैसी कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। यही कारण है कि अब कई बड़ी कंपनियों ने अपने मैन्युफैक्चरिंग उद्योग-धंधों के लिए चीन के अलावा वैकल्पिक देश की तलाश शुरू कर दी है, जिसमें भारत का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है।

दिलचस्प तो यह है कि भारत ने भी चीन को लेकर फ़िलहाल एक सख्त रुख अपनाने की कोशिश की है। यह कोशिश हाल ही में लाये गये नए एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) और FEMA नियमों से भी साफ़ झलकती है। इन नए नियमों के तहत भारत से भूमि सीमा साझा करने वाले देशों के निवेशकों को अगर भारत की किसी भी कंपनी, स्टार्टअप आदि में निवेश करना है तो पहले सरकार के संबंधित मंत्रायल से मंजूरी लेनी होगी।

इतना ही नहीं, बल्कि इन देशों का कोई निवेशक यदि भारतीय कंपनियों/स्टार्टअप में अपनी मौजूदा हिस्सेदारी बेचना भी चाहता है तो उसको भी भारतीय सरकार से मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। जाहिर है भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों में से चीन पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता नजर आएगा। लेकिन यह नियम इसलिए इतनी सुर्खियाँ बटोर रहें हैं क्योंकि Paytm, MakeMyTrip, Ola, Byju’s, BigBasket,  Zomato और Swiggy सहित कई बड़े भारतीय स्टार्टअप्स में चीनी निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी है।

साथ ही साथ चीन के कई बड़े निवेशक और चीन की सरकार समर्थित कंपनियां वर्तमान समय में भारतीय कंपनियों की वैल्यूएशन/शेयर कीमतों में गिरावट के चलते इनमें हिस्सेदारी खरीदने के मौके तालश रहीं हैं। हाल ही में हमनें ऐसे ही एक उदाहरण के तहत चीन के राज्य संचालित PBOC बैंक को भारत के दूसरे सबसे बड़े प्राइवेट बैंक HDFC में लाखों शेयर ख़रीदते देखा

ऐसे में एक ओर जहाँ केंद्र सरकार चीन के खिलाफ़ एक सांकेतिक कदम के जरिये विश्व भर में संदेश देने की कोशिश कर रही है, वहीँ भारत के प्रमुख राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब खुलकर तमाम बड़ी कंपनियों को चीन से कारोबार समेत यूपी आने का न्यौता दिया है। जी हाँ! उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने COVID-19 के हालातों में एक बड़ा दांव चलते हुए कई बड़ी अमेरिकी कंपनियों को सीधे तौर पर कहा है कि अगर वह चीन से निकलकर अपनी फैक्ट्रियों और आधार को यूपी में शिफ्ट करती हैं तो उन्हें मनमुताबिक सहूलियत दी जा सकती है।

Yogi Adityanath, CM Yogi , FedEx, Cisco, Adobe, China, Uttar Pradesh, COVID 19 Impact,

इस न्यौतें को लेकर जिन कंपनियों का मुख्यमंत्री योगी ने प्रमुखता से जिक्र किया उसमें FedEx, UPS, Cisco, Adobe, Lockheed Martin, Honeywell, Boston Scientific आदि शामिल हैं।

किन-किन सहूलियतों को देने की कोशिशों में है यूपी सरकार

उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया के इस ऐलान के बाद राज्य सरकार में छोटे और मध्यम उद्योग, निवेश और निर्यात मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने बताया कि लगातार उनसे कई ऐसे सवाल पूछें जाने लगें हैं की उत्तर प्रदेश सरकार कंपनियों को चीन से शिफ्ट करने पर क्या-क्या सुविधाएं देगी? हालाँकि उनके जवाब से लगता है कि अभी राज्य सरकार ने इसकी व्यापक रुपरेखा तैयार नहीं की है, लेकिन इतना जरुर है कि इस मंशा को खुलकर जाहिर करना ही फ़िलहाल के लिए एक अहम कदम हो जाता है। वहीँ सिद्धार्थ नाथ सिंह ने इतना जरुर कहा कि कंपनियों की हर उचित जरूरत के मुताबिक प्रावधान दिए जायेंगें।

लेकिन इसको लेकर कुछ संभावित उदाहरण भी दिये गये जैसे FedEx और UPS को अपने संचालन के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के इस्तेमाल की इजाजत दी जा सकती है। ऐसे ही डिफेंस फर्म जैसे Lockheed Martin को भी उत्तर प्रदेश के डिफेंस कॉरिडोर का इस्तेमाल करने संबंधी सहूलियतें दी जा सकतीं हैं।

सिद्धार्थ नाथ सिंह ने यह भी बताया कि मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनी Boston Scientific ने राज्य द्वारा दिए जा सकने वाली सुविधाओं के बारे में पूछा भी है, जिसके जवाब में उन्हें कहा गया कि राज्य उनकी जरूरत के मुताबिक सुविधाओं व बदलावों पर चर्चा करने को तैयार है। साथ ही मंत्री जी ने यह भी सुझाव दिया कि लखनऊ कंपनी के लिए एक बेहतरीन लोकेशन साबित हो सकती है।

केंद्र सरकार का क्या है रुख? 

आपको बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही राज्यों को यह बताया था कि कई विदेशी कंपनियां COVID-19 के चलते बने हालतों के सामान्य होने के बाद चीन से निकलर भारत आना चाहती हैं और ऐसे में राज्यों को इन नए अवसरों के लिए भी तैयार रहना होगा।

दरसल इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को आधार मानें तो प्रधानमंत्री द्वारा इस बात के संकेत देने के बाद ही उत्तर प्रदेश की सरकार ने अमेरिका के 100 निवेशकों और कंपनियों से वीडियो कॉन्फ्रेंस की थी। जिसके बाद सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने यह निर्णय लिया।

तुलनात्मक रूप से सस्ती मजदूरी और विदेशी भाषाओँ की पकड़, भारत को विकल्प बनने में दे सकती है अहम सहयोग:

असल में विदेशों में निर्माण के पैमानें पर मैन्युफैक्चरिंग लेबर कॉस्ट एक सबसे अहम पहलु होता है, जो गुणवत्ता, समय पर डिलीवरी और व्यापार प्रभावित करता है। आंकड़ों की बात करें तो चीन की तुलना में भारत का मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट काफी सस्ती है। Genimex की एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 में प्रति घंटे मैन्युफैक्चरिंग लेबर कॉस्ट औसत भारत में $0.92 थी, वहीँ चीन में यह $3.52 थी। ऐसे में जाहिर है कि कंपनियों को यह पहलु भी आकर्षित करता नजर आये।

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लेकिन इतना ही नहीं अमेरिकी और ब्रिटेन की कंपनियों के लिए भारत में कारोबार करना भाषाओं के लिहाज़ से भी आसान हो जाता है। दरसल चीन में जहाँ एक ओर लोग और संस्थाएं अपनी भाषा को लेकर काफी सख्त नज़र आती हैं, वहीँ अंग्रेजी भारत की दूसरी भाषा आधिकारिक भाषा है और इसलिए व्यावसायिक अधिकारियों ने संचालन के लिए इसको तेजी से अपनाने का काम किया है। साथ ही सही मायनों में एक लोकतांत्रिक देश के टैग के साथ भारत अन्य देशों के लोगों को सामाजिक और सांस्कृतिक लिहाज़ से भी अधिक खींचता है।

लेकिन लॉजिस्टिक और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं के पैमाने पर अब तक चीन ही लेता रहा है बढ़त:

नई सड़कें, राजमार्ग, रेलवे ट्रैक, जलमार्ग और हवाई अड्डे चीन को हमेशा से लॉजिस्टिक पैमाने पर भारत से आगे खड़े करते रहें हैं। हक़ीकत यह है कि भारत सड़कों के एक विशाल नेटवर्क पर बहुत अधिक निर्भर करता है, लेकिन इसके बाद भी देश में सड़कों की हालत उतनी बेहतर नहीं कही जा सकती खास तौर पर चौड़ाई आदि को लेकर, जिससे आराम से सामान भारी वाहनों से इधर-उधर ले जाए जा सके।

वहीँ प्रोडक्टिविटी (उत्पादकता) की बात करें तो चीन ने निर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं और अन्य संबंधित पक्ष भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के निकट होने के चलते विशेष आर्थिक क्षेत्र और औद्योगिक समूह के रूप में काम करते हैं। और इसलिए इनकी उत्पादकता क्षमता भी भारत से तुलनात्मक रूप से अधिक रही है। McKinsey के अनुसार चीनी निर्माता असल में सामान भारतीय निर्माताओं की तुलना में पांच गुना अधिक प्रोडक्टिव मानें जातें रहें हैं।

शायद यही सब कुछ प्रमुख मुद्दों में से हैं जो आज तक लगभग कई विदेशी कंपनियों चीन की और ही रुख करती नजर आती रहीं थी। हालाँकि अब देखना यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस ऐलान का असर कितने समय में वास्तविकता के रूप में नजर आने लगेगा।

दरसल उत्तर भारतीय क्षेत्रों खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों को हमेशा से कार्य क्षमताओं का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन यह सभी लोग काम की तलाश में अक्सर अन्य राज्यों का रुख करतें हैं, जैसे बेंगलुरु, मुम्बई, चेन्नई, दिल्ली आदि। दरसल देश का अधिकतर व्यावसायिक गढ़ इन्हीं राज्यों तक ही सिमटा हुआ है, जिसके चलते उत्तर प्रदेश और बिहार से सबसे अधिक लोग बतौर प्रवासी इन राज्यों में जाकर कमाई करते नजर आतें हैं

दरसल उपरोक्त संभावनाओं के लिए यूपी में क्षमता, प्रतिभा, पैसा लगभग सभी संसाधन मौजूद हैं, लेकिन जरूरत कब से है कि स्थानीय राजनीतिक प्रथाओं से बाहर सोच का दायरा बढ़ाकर इस दिशा में सरकार द्वारा पहल की जाती। ऐसे में शुरुआत हुई है शायद जल्द ही परिणाम भी नजर आने लगें।

और यही यह संभव हो गया तो शायद ऐसा दिन भी आये की बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली या चेन्नई के बजाए लोगों के पास यूपी में ही बेहतरीन विकल्प हों और मौजूदा हालतों के विपरीत अन्य राज्यों से से लोग यूपी आना शुरू कर दें।

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